Friday, March 11, 2011

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकलेबहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकलेडरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन परवो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिनबहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकलेभ्रम खुल जाये जालीम तेरे कामत कि दराजी काअगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवायेहुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामीफिर आया वो जमाना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकलेहुई जिनसे तव्वको खस्तगी की दाद पाने कीवो हमसे भी ज्यादा खस्ता-ए-तेग-ए-सितम निकलेमुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने काउसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकलेजरा कर जोर सिने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकलेजो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले खुदा के बासते पर्दा ना काबे से उठा जालिमकहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकलेकहाँ मयखाने का दरवाजा 'गालिब' और कहाँ वाइज़पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था के हम निकले

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