Friday, July 9, 2010

खामोश इश्क

तुम्हे बिन पाए खोने से डरता हूँ
मै तुमेह बेपनाह इश्क करता हूँ
दिल की हकीकत कैसे करू बयाँ
तेरे खफा हो जाने से डरता हूँ
खोया रेहता तेरे खयालो में
भीड़ में भी तेरा ही चेहरा ढून्ढ ता हूँ
दिल की हकीकत कैसे करू बयाँ
तेरे खफा हो जाने से डरता हूँ
हर शय में दिखता है तेरा ही चेहरा
हर आह्टमें तेरी आमद सी लगती
देख तेरे नजरो की मयकशी
मैं होश खोने से डरता हूँ
दिल की हकीकत कैसे करूँ बयाँ
तेरे खफा हो जाने से डरता हूँ
चाहत चकोर सा है दिल में
पर फजर से डरता हूँ
हकीकत क्या है तेरे दिल की,रवि
ये जानने को मैं तड़पता हूँ
दिल की हकीकत कैसे करू बयाँ
तेरे खफा हो जाने से डरता हूँ

रवि राज

3 comments:

  1. Dear Ravi,
    its beautiful. Darta rah.... kah bhi nahi sakta to kar kya......

    Ye to time time ki baat hai jaani.







    d

    ReplyDelete
  2. बहुत अच्‍छी अभिव्‍यक्ति‍ !!

    ReplyDelete